वहीं प्रधानमंत्री के बचाव में उतरी सरकार और कांग्रेस पार्टी ने टाइम मैगजीन के सहारे ही बीजेपी पर पलटवार किया। बीजेपी को टाइम मैगजीन में छपे 2002 के उस लेख की याद दिलाई जिसमें वाजपेयी के काम-काज के तौर तरीके पर तमाम टिप्पणियां की गई थीं।
दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती और आर्थिक नीतियों को लकवा मारने के लिए अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। और दुनिया की एक बेहद अहम पत्रिका, सीधे-सीधे कहिए सबसे ताकतवर अमेरिकी पत्रिका। इस ढिलाई के लिए मनमोहन की ओर उंगलियां उठा रही है। मनमोहन के नेतृत्व पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। उनकी काबलियत को कम आंका जा रहा है।
साफ है मनमोहन का TIME खराब चल रहा है। उन्हें एक कमजोर नेता बताया जा रहा है। अपनी आर्थिक नीतियों के लिए कभी अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के चहेते रहे मनमोहन सिंह का जादू अब खत्म हो रहा है। उनकी साख तेजी से घट रही है। TIME मैग्जीन में 'ए मैन इन शैडो' शीर्षक से छपी रिपोर्ट के मुताबिक आर्थिक विकास में आई गिरावट की चुनौती, भारी वित्तीय घाटे और रुपए की गिरती कीमत के अलावा सरकार को भ्रष्टाचार से भी जूझना पड़ रहा है। बढ़ती महंगाई और घोटालों ने सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया है। नतीजा ये है कि मनमोहन सरकार पर वोटरों का भरोसा कम होता जा रहा है। सरकार आर्थिक दिशा भी तय नहीं कर पा रही है। लिहाजा घरेलू और विदेशी निवेशक घबरा रहे हैं।
मनमोहन सिंह के पतन का जिक्र करते हुए टाइम ने लिखा है। पिछले तीन सालों में वो शांत आत्मविश्वास जो कभी उनके चेहरे पर चमकता था, गायब हो गया है। लगता है वो अपने मंत्रियों को नियंत्रित नहीं कर पा रहे और उनके नए मंत्रालय, वित्त मंत्रालय का अस्थायी कार्यभार, सुधारों को लेकर बहुत इच्छुक नहीं है, ये वो सुधार हैं जिनसे उस उदारीकरण को जारी रखा जा सकेगा जिसकी शुरूआत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी।
TIME ने आगे लिखा है कि ऐसे वक्त में जब भारत आर्थिक विकास में धीमेपन को सहन नहीं कर सकता, विकास और नौकरियों को बढ़ाने में मददगार विधेयक संसद में अटके पड़े हैं। नेता फौरी फायदा देख रहे हैं, लोकलुभावन बातें और वैसे ही फैसले ले रहे हैं जिनकी वजह से देश का बड़ा लक्ष्य कहीं पीछे छूट गया है।
मनमोहन सिंह के पतन का जिक्र करते हुए टाइम ने लिखा है। पिछले तीन सालों में वो शांत आत्मविश्वास जो कभी उनके चेहरे पर चमकता था, गायब हो गया है। लगता है वो अपने मंत्रियों को नियंत्रित नहीं कर पा रहे और उनके नए मंत्रालय, वित्त मंत्रालय का अस्थायी कार्यभार, सुधारों को लेकर बहुत इच्छुक नहीं है, ये वो सुधार हैं जिनसे उस उदारीकरण को जारी रखा जा सकेगा जिसकी शुरूआत में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी।
TIME ने आगे लिखा है कि ऐसे वक्त में जब भारत आर्थिक विकास में धीमेपन को सहन नहीं कर सकता, विकास और नौकरियों को बढ़ाने में मददगार विधेयक संसद में अटके पड़े हैं। नेता फौरी फायदा देख रहे हैं, लोकलुभावन बातें और वैसे ही फैसले ले रहे हैं जिनकी वजह से देश का बड़ा लक्ष्य कहीं पीछे छूट गया है।
TIME पत्रिका मनमोहन सिंह की साख पर लगते बट्टे के पीछे की वजहें भी तलाशती है। पत्रिका पूरे परिदृश्य में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लाती है। कहती है कि सोनिया गांधी के साथ शक्तियों के अघोषित बंटवारे की वजह से भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह फैसले नहीं कर पा रहे हैं। शक्तियों का अशोषित बंटवारा आखिर किस ओर इशारा करता है, क्या TIME पत्रिका ये कहना चाहती है कि सोनिया कहीं न कहीं मनमोहन सिंह को खुद अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता नहीं देतीं। बहरहाल, TIME के इस लेख ने भारत में जबरदस्त हलचल मचा दी, एक अंतरराष्ट्रीय पत्रिका के कवर पेज पर हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री की कटु आलोचना से बीजेपी गदगद है।
जाहिर है ये संकट आज का नहीं है, इसकी नींव कई साल पहले से ही पड़ी थी। यूपीए सरकार की दूसरी पारी शुरूआत से ही संकट से घिरी रही है। टेलीकॉम, कॉमनवेल्थ और आदर्श सोसायटी से जुड़े घोटालों से सरकार की साख घटी। सरकार पर सही वक्त पर नीतिगत फैसले न ले पाने का आरोप लगता रहा। रिटेल में एफडीआई, पेंशन बिल जैसे अहम बिल गठबंधन राजनीति की वजह से ठंडे बस्ते में पड़े हैं। 2011-12 की आखिरी तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.3 फीसदी हो गई जो पिछले दस सालों में सबसे कम है। सरकार का वित्तीय घाटा लगातारा बढ़ रहा है। सरकार की कमाई का 16 फीसदी हिस्सा लोकलुभावन सब्सिडी देने में खर्च हो जाता है। GST यानि गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स का मुद्दा अब तक सुलझ नहीं सका है। तमाम दावों के बावजूद महंगाई में कमी नहीं आ पाई है।
जाहिर है संकट गंभीर है। भारत सरकार आर्थिक लकवे से जूझे या अपने सेनापति पर उठती उंगलियों से निपटे। प्रधानमंत्री का TIME खराब है, ये देखते ही दो दो आला मंत्री मनमोहन सिंह के बचाव में उतर पड़े। खुद कांग्रेस पार्टी भी दुनिया भर में छाई मंदी का हवाला देकर सरकार का बचाव कर रही है।
चिदंबरम ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर टिप्पणी करने से पहले जून 2002 में आए उस लेख को बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद को पढ़ना चाहिए था। वहीं केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी और कमल नाथ ने भी अपने पीएम का बचाव किया है। अंबिका सोनी ने यकीन जताया कि पीएम देश को संकट से बाहर निकालने में सफल होंगे, तो वहीं केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ का कहना है कि टाइम मैगजीन को पहले अमेरिका और यूरोप के हालात पर ध्यान देना चाहिए।
जाहिर है ये संकट आज का नहीं है, इसकी नींव कई साल पहले से ही पड़ी थी। यूपीए सरकार की दूसरी पारी शुरूआत से ही संकट से घिरी रही है। टेलीकॉम, कॉमनवेल्थ और आदर्श सोसायटी से जुड़े घोटालों से सरकार की साख घटी। सरकार पर सही वक्त पर नीतिगत फैसले न ले पाने का आरोप लगता रहा। रिटेल में एफडीआई, पेंशन बिल जैसे अहम बिल गठबंधन राजनीति की वजह से ठंडे बस्ते में पड़े हैं। 2011-12 की आखिरी तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.3 फीसदी हो गई जो पिछले दस सालों में सबसे कम है। सरकार का वित्तीय घाटा लगातारा बढ़ रहा है। सरकार की कमाई का 16 फीसदी हिस्सा लोकलुभावन सब्सिडी देने में खर्च हो जाता है। GST यानि गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स का मुद्दा अब तक सुलझ नहीं सका है। तमाम दावों के बावजूद महंगाई में कमी नहीं आ पाई है।
जाहिर है संकट गंभीर है। भारत सरकार आर्थिक लकवे से जूझे या अपने सेनापति पर उठती उंगलियों से निपटे। प्रधानमंत्री का TIME खराब है, ये देखते ही दो दो आला मंत्री मनमोहन सिंह के बचाव में उतर पड़े। खुद कांग्रेस पार्टी भी दुनिया भर में छाई मंदी का हवाला देकर सरकार का बचाव कर रही है।
चिदंबरम ने कहा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर टिप्पणी करने से पहले जून 2002 में आए उस लेख को बीजेपी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद को पढ़ना चाहिए था। वहीं केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी और कमल नाथ ने भी अपने पीएम का बचाव किया है। अंबिका सोनी ने यकीन जताया कि पीएम देश को संकट से बाहर निकालने में सफल होंगे, तो वहीं केंद्रीय शहरी विकास मंत्री कमलनाथ का कहना है कि टाइम मैगजीन को पहले अमेरिका और यूरोप के हालात पर ध्यान देना चाहिए।
विचारणीय मुददे की ओर ध्यान दिलाने का शुक्रिया।
ReplyDelete............
ये है- प्रसन्न यंत्र!
बीमार कर देते हैं खूबसूरत चेहरे...